राफेल-मिसाइलें बेकार हैं अगर AI सॉफ्टवेयर नहीं: लेफ्टनेंट जनरल राज शुक्ला

राफेल-मिसाइलें बेकार हैं अगर AI सॉफ्टवेयर नहीं: लेफ्टनेंट जनरल राज शुक्ला
13 अप्रैल 2026 1 टिप्पणि Kaushal Badgujar

भारत के रक्षा क्षेत्र में अब सिर्फ लोहे और बारूद के दम पर जीत हासिल नहीं की जा सकती। लेफ्टनेंट जनरल राज शुक्ला (रिटायर्ड), जो आर्मी ट्रेनिंग कमांड के पूर्व जनरल ऑफिसर कमांडिंग रहे हैं, ने एक चौंकाने वाला दावा किया है। 17 मार्च, 2026 को ANI को दिए एक विशेष इंटरव्यू में उन्होंने साफ कहा कि राफेल जैसे फाइटर जेट और घातक मिसाइलें तब तक बेकार हैं, जब तक उनके पास उन्हें सटीक तरीके से चलाने वाला AI सॉफ्टवेयर न हो। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर भारत ने अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में भारी निवेश नहीं किया, तो भविष्य के युद्धों में हम पिछड़ जाएंगे।

दरअसल, यह बात उन्होंने इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026नई दिल्ली के दौरान कही। जनरल शुक्ला का मानना है कि हम 'एल्गोरिदम युद्ध' (Algorithmic Warfare) के दौर में प्रवेश कर चुके हैं, जहाँ हार्डवेयर से ज्यादा सॉफ्टवेयर की अहमियत है।

हार्डवेयर की चमक और सॉफ्टवेयर की हकीकत

अक्सर हम गर्व करते हैं कि हमारे पास दुनिया के सबसे बेहतरीन विमान और मिसाइलें हैं, लेकिन जनरल शुक्ला ने इस सोच को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि युद्ध के मैदान में कोई भी हथियार तब तक प्रभावी नहीं होता जब तक उसकी 'डिलीवरी' सटीक न हो।

उन्होंने समझाया कि आधुनिक युद्ध अब केवल ताकत का खेल नहीं, बल्कि डेटा और गणना का खेल बन गया है। उनके मुताबिक, राफेल और मिसाइलें महज औजार हैं; असली दिमाग वह सॉफ्टवेयर है जो तय करता है कि हमला कहाँ, कब और कैसे करना है। अगर सॉफ्टवेयर पुराना है या AI से लैस नहीं है, तो करोड़ों डॉलर के ये हथियार सिर्फ शोपीस बनकर रह जाएंगे।

मिलिट्री LLMs और डेटा इंजीनियरों की जरूरत

एक कड़वी सच्चाई यह भी सामने आई कि सेना के भीतर AI को समझने और लागू करने वाले नेतृत्व की कमी है। जनरल शुक्ला ने बेबाकी से कहा, "AI सिखाने के लिए कोई एडिशनल सेक्रेटरी या मेजर जनरल का होना बेकार है; उनके पास AI की वास्तविक समझ नहीं है।"

उन्होंने एक ठोस योजना का सुझाव दिया है: सेना को कम से कम 50 अनुभवी डेटा इंजीनियरों की एक टीम तैनात करनी चाहिए। यह टीम विशेष रूप से मिलिट्री के लिए 'लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स' (LLMs) विकसित करेगी। यहाँ एक पेंच यह है कि सेना का डेटा और युद्ध की रणनीतियाँ नागरिक क्षेत्र (Civil Sector) के साथ साझा नहीं की जा सकतीं। इसलिए, हमें अपने खुद के, सुरक्षित और गुप्त रक्षा-विशिष्ट AI मॉडल्स की जरूरत है।

मंत्री अश्विनी वैष्णव के मॉडल और सेना की मांग

भारत सरकार के अश्विनी वैष्णव द्वारा विकसित 12 AI मॉडल्स का जिक्र करते हुए जनरल शुक्ला ने कहा कि इनमें से कम से कम 3 या 4 मॉडल पूरी तरह से सेना को सौंप दिए जाने चाहिए। क्योंकि सैन्य डेटा बेहद संवेदनशील होता है, इसे सामान्य नागरिक स्ट्रीम में नहीं डाला जा सकता।

रूस-यूक्रेन और गाजा: AI युद्ध के जीते-जागते उदाहरण

रूस-यूक्रेन और गाजा: AI युद्ध के जीते-जागते उदाहरण

आधुनिक युद्ध की तस्वीर बदलने के लिए जनरल शुक्ला ने कुछ डराने वाले आंकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे संघर्ष में लगभग 70-80 प्रतिशत हताहतों के लिए ड्रोन जिम्मेदार रहे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि AI के आने से FPV (फर्स्ट-पर्सन व्यू) ड्रोन्स की सटीकता, जो पहले केवल 30-50 प्रतिशत थी, अब बढ़कर लगभग 80 प्रतिशत हो गई है। उन्होंने गाजा और मध्य पूर्व के संघर्षों को दुनिया का पहला "AI युद्ध" करार दिया, जहाँ टारगेट तय करने, खुफिया जानकारी जुटाने और 'किल चेन' को ऑप्टिमाइज़ करने के लिए AI का भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है।

वैश्विक बाजार और भविष्य की चुनौतियाँ

वैश्विक बाजार और भविष्य की चुनौतियाँ

यह सिर्फ भारत की बात नहीं है, पूरी दुनिया इस दौड़ में है। मिलिट्री AI का बाजार 2023 में 9.9 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, जिसके 2035 तक बढ़कर 35 बिलियन डॉलर होने का अनुमान है। यह दिखाता है कि दुनिया भर की सेनाएँ अब सॉफ्टवेयर पर दांव लगा रही हैं।

जनरल शुक्ला के अनुसार, AI अब इन चार क्षेत्रों में अनिवार्य हो गया है:

  • स्वचालित हथियार प्रणालियाँ (Automatic Weapons Systems)
  • साइबर सुरक्षा (Cyber Security)
  • लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन (Logistics)
  • निगरानी और जासूसी अभियान (Surveillance)

हालांकि, मशीन द्वारा जीवन और मृत्यु का फैसला लेने जैसे नैतिक सवाल (Ethical Challenges) खड़े होते हैं, लेकिन उनका मानना है कि रणनीतिक बढ़त (Strategic Advantage) हासिल करने के लिए इन जोखिमों को स्वीकार करना होगा। जो देश AI में निवेश नहीं करेंगे, वे भविष्य के युद्धों में अस्तित्व के संकट का सामना करेंगे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

लेफ्टनेंट जनरल राज शुक्ला के अनुसार राफेल और मिसाइलें 'बेकार' क्यों हैं?

उनका मतलब यह नहीं है कि हथियार खराब हैं, बल्कि यह है कि बिना उन्नत AI सॉफ्टवेयर के, ये हथियार अपनी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर सकते। AI ही वह तकनीक है जो इन हथियारों की डिलीवरी, लक्ष्य निर्धारण और सटीकता को बढ़ाती है, जिसके बिना ये महंगे उपकरण अप्रभावी हो जाते हैं।

सैन्य AI के लिए डेटा इंजीनियरों की आवश्यकता क्यों है?

सैन्य डेटा अत्यंत गोपनीय होता है और इसे नागरिक AI मॉडल्स के साथ साझा नहीं किया जा सकता। इसलिए, सेना को अपने स्वयं के सुरक्षित 'लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स' (LLMs) बनाने के लिए विशेषज्ञ डेटा इंजीनियरों की आवश्यकता है जो युद्ध की रणनीतियों को सॉफ्टवेयर में बदल सकें।

रूस-यूक्रेन युद्ध ने AI की अहमियत को कैसे साबित किया?

इस युद्ध में देखा गया कि AI-संचालित ड्रोन हमलों की सटीकता 30-50% से बढ़कर 80% हो गई है। इसके अलावा, कुल हताहतों में 70-80% हिस्सा ड्रोन्स का रहा है, जो यह दर्शाता है कि अब युद्ध का केंद्र पारंपरिक तोपखाने से हटकर AI-ड्रिवन ऑटोनॉमस सिस्टम्स की ओर जा रहा है।

मिलिट्री AI मार्केट का भविष्य क्या है?

वैश्विक मिलिट्री AI मार्केट तेजी से बढ़ रहा है। 2023 में यह 9.9 बिलियन डॉलर था और अनुमान है कि 2035 तक यह 35 बिलियन डॉलर तक पहुँच जाएगा। यह वैश्विक स्तर पर हथियारों की दौड़ को सॉफ्टवेयर-आधारित युद्ध की ओर ले जा रहा है।

क्या AI के इस्तेमाल में कोई नैतिक खतरा है?

हाँ, सबसे बड़ा खतरा यह है कि मशीनें जीवन और मृत्यु का निर्णय ले सकती हैं। हालांकि, जनरल शुक्ला का तर्क है कि यदि प्रतिद्वंदी देश AI का उपयोग कर रहे हैं, तो भारत के लिए रणनीतिक बढ़त हासिल करने हेतु AI अपनाना अनिवार्य है, अन्यथा हम युद्ध में पिछड़ जाएंगे।

1 टिप्पणि

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    Ashish Gupta

    अप्रैल 13, 2026 AT 19:25

    भाई, एकदम सही बात कही है! 🚀 अब जमाना डेटा का है, सिर्फ मशीनों से काम नहीं चलेगा। हमें अपने टेक एक्सपर्ट्स को सेना में लाना ही होगा वरना हम पिछड़ जाएंगे। जोश बढ़ाओ भारत! 🔥🇮🇳

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